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Thursday, February 22, 2024
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झारखंड का एक ऐसा जिला जहां आलू-प्याज के भाव मिलता है काजू, जानिये..

झारखंड का काजू शहर

काजू को ड्राई फ्रूट्स में काफी पौष्टिक और महंगा माना जाता है, जिसे अमीर लोग आसानी से खरीद कर इस्तेमाल कर लेते हैं। क्योंकि आज इसकी बाजार कीमत 800 से 1000 रुपये प्रति किलो है। जिसे मिडिल और लो क्लास के लिए खरीदना मुश्किल है। इस ड्राई फ्रूट को उनके घर के बजट में शामिल करना मुश्किल है।

हालांकि काजू सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। लोग इसे पसंद भी करते हैं। लेकिन आम लोग इसे नहीं खरीद पा रहे हैं। क्योंकि 800 से 1000 रुपये का रेट उनके लिए बहुत मायने रखता है।

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लेकिन शायद आप नहीं जानते कि 1000 रुपये किलो बिकने वाला ये काजू भारत के एक जिले में कौड़ियों के भाव बिकता है। आपको यह जानकर हैरानी होगी, लेकिन इस शहर में आपको आलू और प्याज के भाव में काजू मिल जायेंगे।

सड़क किनारे 20 से 30 रुपये किलो काजू बेचती मिल जायेंगी महिलायें

आप सोच रहे होंगे कि भारत का कौन सा शहर ऐसा होगा। इतना सस्ता होता तो हमें इतना महंगा क्यों मिलता है। आपका सवाल वाजिब है लेकिन बता दें कि ये शहर झारखंड का जामताड़ा है। यहां काजू महज 30 से 40 रुपये किलो मिल रहा है। आखिर इतनी सस्ती होने की वजह क्या है। तो बता दें कि झारखंड में हर साल हजारों टन काजू का उत्पादन होता है। यहां महिलायें सड़क किनारे 20 से 30 रुपए किलो काजू बेचती नजर आयेंगी।

करीब 50 एकड़ जमीन में होती है काजू की खेती

जामताड़ा के नाला गांव में करीब 50 एकड़ जमीन में काजू की खेती होती है। इसे झारखंड का काजू शहर कहा जाता है। यहां काजू का बागान ऐसा झारखंड में कहीं नहीं है। यहां बड़े-बड़े बाग हैं। जहां काम करने वाले लोग ड्राई फ्रूट्स को बेहद सस्ते दामों में बेचते हैं। यहां के किसानों के पास खेती करने की ज्यादा सुविधा नहीं है, लेकिन फिर भी किसान इस खेती से खुश हैं। जिला प्रशासन और वन विभाग ने इस साल लगभग 50,000 काजू के पौधे लगाने की योजना बनायी है।

1990 से हो रही खेती

यहां की जलवायु और मिट्टी काजू की खेती के लिए अनुकूल है। बात साल 1990 के आसपास की है। किसानों के मुताबिक तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ने ओडिशा के कृषि वैज्ञानिकों की मदद से जमीन की जांच करायी तो पाया कि यहां की मिट्टी काजू की खेती के लिए बेहतर है। इसके बाद उन्होंने काजू की खेती शुरू की। वन विभाग ने बड़े पैमाने पर काजू का रोपण किया। देखते ही देखते पौधे पेड़ बन गये। काजू के पेड़ हजारों की संख्या में दिखने लगे।

किसान यहां सस्ते रेट पर बेचते हैं

जब पहली बार काजू फल आया तो ग्रामीण उसे देखकर खुशी से झूम उठे। बाग से काजू उठाकर घर लाकर, इकट्ठा करके औने-पौने दाम में सड़क किनारे बेच देते हैं। चूंकि क्षेत्र में कोई प्रोसेसिंग प्लांट नहीं था, इसलिए उनके लिए फल से काजू निकालना भी संभव नहीं था। जब बंगाल के व्यापारियों को इस बात का पता चला तो उन्होंने इसे थोक में खरीदना शुरू कर दिया। प्रोसेसिंग के बाद व्यापारी अधिक मुनाफा कमाते हैं, लेकिन ग्रामीणों को उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता है।

झारखंड का काजू शहर